TRADITIONAL APPROACH OF DEBIT AND CREDIT- डेबिट और  क्रेडिट  की परम्परागत नियम

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डेबिट और  क्रेडिट  की परम्परागत अवधारणा

TRADITIONAL APPROACH OF DEBIT AND CREDIT

Or

डेबिट और  क्रेडिट  करने के  परम्परागत नियम

TRADITIONAL RULES OF OF DEBIT AND CREDIT

दोहरे स्वरूप की अवधारणा लेखांकन की आधारभूत अवधारणा है । इस अवधारणा के अनुसार प्रत्येक लेनदेन का दोहरा प्रभाव होता है और इसलिए इसे दो स्थानों पर लिखा जाना चाहिए । इस प्रणाली के अनुसार हमें लेन-देन के दोनों पहलुओं को रिकॉर्ड करना चाहिए, जबकि लेन-देन का एक पहलू Debit किया जाएगा और लेन-देन का दूसरा पहलू Credit किया जाएगा । Every debit has a credit and every credit has a debit. परम्परागत अवधारणा के अनुसार खाते मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं –

  1. व्यक्तिगत खाते (Personal Accounts)
  2. अव्यक्तिगत खाते(Impersonal Accounts)

1.व्यक्तिगत खाते (PERSONAL ACCOUNTS)-  वे खाते जो किसी व्यक्ति,फर्म या संस्था से सम्बन्ध रखते हैं व्यक्तिगत खाते कहलाते हैं ।

जैसे राम का खाता, मोहन एण्ड संस का खाता,श्याम एण्ड ब्रदर्श का खाता,बैंक का खाता, अदत्त व्यय खाता, सरकार का खाता, स्कूल का खाता, बीमा कम्पनी का खाता, पूँजी खाता, आहरण खाता आदि। व्यक्तिगत खाते तीन प्रकार के होते हैं

a. प्राकृतिक व्यक्तिगत खाता (NATURAL PERSONAL ACCOUNTS)- प्राकृतिक व्यक्तियों से तात्पर्य मनुष्यों से है और जो खाते मनुष्यों से सम्बन्ध रखते है वे प्राकृतिक व्यक्तिगत खाते कहलाते हैं।जैसे राम का खाता श्याम का खाता मोहन का खाता सपना का खाता दीपा का खाता सानिया का खाता आदि।

b. कृत्रिम व्यक्तिगत खाता(ARTIFICIAL(LEGAL) PERSONAL ACCOUNTS)-  कृत्रिम या बनावटी व्यक्तियों से तात्पर्य उन व्यक्तियों से होता है जिनका शरीर रूप आकार मनुष्यों जैसा नहीं होता  परन्तु उनका व्यवहार मनुष्यों जैसा ही होता है। कृत्रिम व्यक्तिगत  वे व्यक्तिगत खाते है, जो कृत्रिम रूप से कानून द्वारा बनाए जाते हैं, जैसे कॉर्पोरेट निकायों और संस्थानों, के खाते , इन खातों का भौतिक अस्तित्व नहीं है, हालांकि, उन्हें व्यावसायिक सौदों में व्यक्तियों के रूप में पहचाना जाता है (वे व्यक्तिगत खाते जिन्हें कानून की नजर में व्यक्तियों के रूप में माना जाता है)

जैसे- रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का खाता,

टाटा कंपनी लिमिटेड का खाता,

भारतीय स्टेट बैंक का खाता,

राम एंड कंपनी का खाता,

बीएसएनएल का खाता,

एलआईसी का खाता,स्कूल का लेखा-जोखा,

सरकारी लेखा ,

फर्म का खाता,

कम्पनी का खाता, दिल्ली विश्वविद्यालय का खाता, आदि।

c. प्रतिनिधि व्यक्तिगत खाता (REPRESENTATIVE PERSONAL ACCOUNTS)-   प्रतिनिधि व्यक्तिगत खाते वे खाते होते हैं जो किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे पूँजी खाता आहरण खाता अदत्त वेतन खाता पूर्वदत्त किराया खाता अदत्त मजदूरी खाता आदि।

व्यक्तिगत खाते का नियम

RULES OF PERSONAL ACCOUNT

 ” पाने वाले को व्यापार की पुस्तकों में डेबिट किया जाता है और देने वाले को क्रेडिट किया जाता है “
“DEBIT THE RECEIVER,  CREDIT THE GIVER”

अव्यक्तिगत खाते (IMPERSONAL ACCOUNTS)-   वे खाते जो व्यक्तिगत नहीं होते हैं अव्यक्तिगत खाते कहलाते हैं। ये खाते भी दो प्रकार के होते हैं-

1.वास्तविक खाता या सम्पत्ति खाता 

2.नाममात्र का खाता

1.वास्तविक खाता या सम्पत्ति खाता (REAL ACCOUNTS)-   वे खाते जो वस्तुओं ओर सम्पत्तियों से सम्बन्ध रखते हैं वास्तविक खाते या सम्पत्ति खाते कहलाते हैं। वास्तविक खातों में मूर्त और अमूर्त खाते शामिल हैं।

उदाहरण के लिए.  – रोकड़ खाता, भवन खाता, भूमि खाता,मशीनरी खाता, नकद खाता, फर्नीचर खाता, कंप्यूटर खाता,निवेश खाता, मोटर खाता,स्थिरता और फिटिंग खाता, संयंत्र खाता, सद्भावना खाता, कॉपीराइट खाता, पेटेंट खाता, ट्रेडमार्क खाता आदि।

वास्तविक खाते का नियम
RULES OF REAL ACCOUNT
 ” जो वस्तु व्यापार में आती है उसे डेबिट किया जाता है और जो वस्तु व्यापार से जाती है उसे क्रेडिट किया जाता है “
” DEBIT WHAT COMES IN, CREDIT WHAT GOES OUT “

2.नाममात्र का खाता या आयव्यय खाता(NOMINAL ACCOUNTS OR INCOME AND EXPENDITURE ACCOUNTS)-   वे खाते जो व्यापार के आय/लाभ एवं व्ययों/हानि से सम्बन्ध रखते हैं नाममात्र के खाते या आय व्यय खाते कहलाते है। इन खातों का कोई अस्तित्व, रूप या आकार नहीं है। ।

जैसे वेतन खाता, कमीशन खाता, मजदूरी खाता, किराया खाता, विज्ञापन खाता, ब्याज खाता, बट्टा खाता, मूल्यह्रास खाता,  चैरिटी खाता, विज्ञापन व्यय खाता, सामान्य व्यय खाता कार्यालय व्यय खाता माल खाता (खरीद, बिक्री, खरीद वापसी, बिक्री रिटर्न, माल) आदि।  आदि।

नाममात्र के खाते का नियम

RULES OF NOMIONAL ACCOUNT

 ” सभी व्यय तथा हानियों को डेबिट किया जाता है, और सभी आय तथा लाभ को क्रेडिट किया जाता है “
” DEBIT ALL EXPENSES AND LOSSES, CREDIT ALL INCOMES AND GAINS”

जर्नल का अर्थ (MEANING OF JOURNAL)- जर्नल (JOURNAL) एक फ्रांसीसी शब्द है जिसका अर्थ दैनिक डायरी या दैनिक पुस्तक से है । भारत में इसे पंजी या रोजनामचा या नकल बही या रोजमेल के नाम से जाना जाता है।

जर्नल या नकल बही प्रारम्भिक लेखे की वह महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसमें व्यापारी अपने दैनिक वित्तीय व्यवहारों का लेखा पूर्ण विवरण सहित दोहरा लेखा प्रणाली के सिद्धान्त अनुसार करता है, ताकि यह पता लग सके कि कौन सा खाता डेबिट किया गया है और कौन सा खाता क्रेडिट किया गया है।

जर्नल में लेखा करने की क्रिया को पंजीकरण अथवा प्रविष्टिकरण या जर्नलाइजिंग (JOURNALISING) कहा जाता है।

जर्नल का महत्व (IMPORTANCE OF JOURNAL) जर्नल लेखांकन की प्रारम्भिक और महत्वपूर्ण पुस्तक है। प्रत्येक व्यापारी द्वारा यह पुस्तक रखी जाती है। जर्नल के माध्यम से किसी विशेष तिथि को व्यवहारों की जानकारी आसानी से हो जाती है। जर्नल के माध्यम से खाता बही में लेखा करना सरल हो जाता है। व्यापारिक विवादों को निपटाने में जर्नल सहायक होती है। जर्नल के महत्व को निम्न बिन्दुओं द्वारा प्रकट किया जा सकता है-

1 व्यवहारों का पूर्ण विवरण

2 खाताबही में खतौनी करने में सुविधा होती है

3 तिथिवार व्यवहारों का लेखा

4 व्यापारिक विवादों को निपटाने में  सहायक

5 एक ही स्थान पर पूर्ण विवरण

6 अशुद्धियों की कम सम्भावना रहती है

7 अंकेक्षण के लिए प्रमाण

8 गणितीय अशुद्धियों का शीघ्र मिलान

जर्नल का प्रारूप

(FORMAT OF JOURNAL)

                                                                           

   Date  Particulars      L.F.    Debit  (Amount) Credit (Amount)
Rs. Rs.

जर्नल प्रारम्भिक लेखे की महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसका प्रारूप भी निश्चित होता है। इसमें पाँच स्तम्भ (होते हैं।

1.दिनाँक (DATE)- यह स्तम्भ तिथि के लिए होता है। इस स्तम्भ में सर्वप्रथम ऊपर की ओर अंकों में वर्ष लिखा जाता है और इसके पश्चात् माह का नाम और फिर तारीख लिखी जाती है।

2.विवरण (PARTICULARS)-  इस स्तम्भ में सौदे का सम्पूर्ण विवरण लिखा जाता है जिस खाते को डेबिट किया जाता है उसे ऊपर वाली लाइन में लिखा जाता है और जिस खाते को क्रेडिट किया जाता है उसे नीचे वाली लाइन में लिखा जाता है इसके पश्चात् सौदे का ब्योरा लिखा जाता है।

3.खाता पृष्ठ संख्या (LEDGER FOLIO OR L.F.)-  यह स्तम्भ खाताबही में खोले गये सम्बन्धित खाते की पृष्ठ संख्या को प्रदर्शित करता है। इससे यह जानने में  सुविधा होती है कि कौनसा खाता खाताबही मे किस पृष्ठ पर खोला गया है।

4.डेबिट राशि (DEBIT AMOUNT)-  इस स्तम्भ में उस खाते की रकम लिखी जाती है जिसे जर्नल प्रविष्टि में डेबिट किया जाता है।

5.क्रेडिट राशि(CREDIT AMOUNT)-   इस स्तम्भ में उस खाते की रकम लिखी जाती है जिसे जर्नल प्रविष्टि में क्रेडिट किया जाता है।

 

जर्नल में लेखा करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

THINGS TO KEEP IN MIND WHEN ACCOUNTING IN THE JOURNAL

1    तारीख लिखते समय सर्वप्रथम वर्ष फिर माह और फिर तारीख लिखी जाती है।

2    जर्नल करते समय जिस खाते को डेबिट किया जाता है उसे हमेशा ऊपर वाली लाईन में लिखा जाता है, और खाते के सामने संक्षेप में Dr. शब्द लिखा जाता है और जिस खाते को क्रेडिट किया जाता है, उसे नीचे वाली लाईन में लिखा जाता है तथा खाते के पहले कुछ स्थान छोड़ते हुए अंग्रेजी शब्द To लिखा जाता है । इसके पश्चात् सौदे का ब्यौरा (Narration)  लिखा जाता है। ब्यौरा के पहले Being or For  शब्द का प्रयोग किया जाता है।

3    जिस खाते को डेबिट किया जाता है उसकी रकम डेबिट खाने (Debit Column) में लिखी  जाती है और जिस खाते को क्रेडिट किया जाता है उसकी रकम क्रेडिट खाने (Credit Column) में लिखी जाती है।

4    जिस व्यापारी की पुस्तकें बनायी जा रही हों उसमें उस व्यापारी का नाम नहीं लिखा जाता है।

5    सौदों की पहचान करने यह देखा जाता है कि कौन से खाते प्रभावित हो रहे हैं  यह पता करने के बाद खातों को डेबिट एवं क्रेडिट करने के नियमों का प्रयोग किया जाता है।

6    व्यक्तियों के नाम के आगे खाता शब्द नहीं लगाया जाता है। यदि लगाना हो तो इस प्रकार से Jay’s A/c  लिखा जाता है।

7    डेबिट को संक्षेप में Dr. लिखा जाता है और क्रेडिट को संक्षेप में Cr. लिखा जाता है।

8    जर्नल(नकलबही) प्रारम्भिक पुस्तक है।

9    जब व्यक्ति का नाम दिया हो और सौदे के साथ नकद शब्द दिया हो तो सौदा हमेशा उधार ही माना जाता है।

10   यदि व्यक्ति का नाम दिया हो और नकद शब्द दिया हो तो सौदा नकद ही माना जाता है।

11   यदि केवल यह कहा गया हो कि माल खरीदा तो सौदा नकद ही माना जाता है।

12   व्यापारिक छूट नकद उधार दोनों प्रकार के सौदों पर की जाती है। इसका लेखा पुस्तकों में नहीं किया जाता है। वरन् इसे  सीधे घटाकर दिखाया जाता है।

13   नकद छूट केवल नकद सौदों पर ही दी जाती है। इसका लेखा पुस्तकों में किया जाता है। यह छूट भुगतान के समय दी जाती है।

14   लेखे हमेशा व्यवसाय की दृष्टि से किये जाते हैं व्यापारी या व्यवसायी की दृष्टि से नहीं।

15   जब योग को अगले पृष्ठ पर ले जाया जाता है तो Total C/f लिखा जाता है तथा अगले पेज पर लाये गये योग को Total B/f करके लिखा जाता है।

16   लेखा हमेशा ऐसे व्यवहारों का किया जाता है जिनका कोई मौद्रिक मूल्य होता है। ऐसे व्यवहार जिनका कोई मौद्रिक मूल्य नहीं होता उनका लेखा नहीं किया जाता है।

17   लेखे प्रमाणकों के आधार पर ही किये जाते हैं।

18   लेखा करते समय आधुनिक नियमों को  भी ध्यान में रखा जाता है।

19   अवास्तविक खातों को आगम खाता भी कहते हैं।

20   क्रय को व्यय और विक्रय को आगम माना जाता है।

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